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Diwali - Inner light - भीतर का दीया - Hindi Video - knowledgemi.com

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दिवाली पर्व पर सद्गुरु  का  सम्बोधन

आदमी है, अमावस की रात। और दिवाली तुम बाहर कितनी ही मनाओ, भीतर का अंधेरा बाहर के दीयों से कटता नहीं, कटेगा नहीं। धोखे तुम स्वयं को कितने ही दो, अंतत: पछताओगे। दिवाली हम अमावस की रात मनाते हैं! रात है अंधेरे की, तो दीयों की पंक्तियां जला लेते हैं। पर दीए तो बाहर होंगे। दीए भीतर नहीं जा सकते। बाहर की कोई प्रकाश की किरण भीतर प्रवेश नहीं कर सकती। भीतर की अमावस तो भीतर ही रहती है। बाहर की पूर्णिमा कितनी ही बनाओ, तुम तो भीतर जानते ही हो उस बुझे हुए दीपक को। तुम तो भीतर रोते ही रहोगे। तुम्हारी सब मुस्कुराहटें भी तुम्हारे आंसुओं को छुपाने में असमर्थ हैं। और छुपा भी लें तो सार क्या? मिटाने में निश्चित ही असमर्थ हैं।

धोखे छोड़ो! इस सीधे सत्य को स्वीकार करो कि तुम बुझे हुए दीपक हो। होने की जरूरत नहीं है। होना तुम्हारी नियति भी नहीं है। ऐसा होना ही चाहिए, ऐसा कोई भाग्य का विधान नहीं है। अपने ही कारण तुम बुझे हुए हो। अपने ही कारण चांद नहीं उगा। अपने ही कारण भीतर प्रकाश नहीं जगा। कहां भूल हो गई है? कहां चूक हो गई है?

तुम्हारा सारा प्रकाश बाहर पड़ रहा है- वृक्षों पर, पर्वतों पर, पहाड़ों पर, लोगों पर। लेकिन तुम एक अपने पर अपनी रोशनी नहीं डालते। सबको देख लेते हो अपने प्रति अंधे रह जाते हो। और सबको देखने से क्या होगा? जिसने अपने को न देखा, उसने कुछ भी न देखा।

आज के सूत्र तुम्हारे भीतर का दीया कैसे जले, सच्ची दिवाली कैसे पैदा हो, कैसे तुम भीतर चांद बनो, कैसे तुम्हारे भीतर चांदनी का जन्म हो- उसके सूत्र हैं। बड़े मधु-भरे! इन सूत्रों का कोई मुकाबला नहीं है। बहुत रस-भरे हैं, पीओगे तो जी उठोगे। ध्यान धरोगे इन पर, संभल जाओगे। डुबकी मारोगे इनमें तो तुम जैसे हो, वैसे मिट जाओगे; और तुम्हें जैसा होना चाहिए, वैसे प्रकट हो जाओगे।

जिसको तुम खोज रहे हो, तुम्हारे भीतर बैठा है। तुम्हारी खोज के कारण ही तुम उसे नहीं पा रहे हो। तुम दौड़े चले जाते हो। सारी दिशाओं में खोजते हो, थकते हो, गिरते हो। हर बार जीवन कब्र में समाप्त हो जाता है। जीवन से मिलन नहीं हो पाता। और जिसे तुम खोजने चले हो, जिस मालिक को तुम खोजने चले हो, उस मालिक ने तुम्हारे घर में बसेरा किया हुआ है। तुम जिसे खोजने चले हो, वह अतिथि नहीं है, आतिथेय है। खोजने वाले में ही छिपा है। वह जो गंतव्य है, कहीं दूर नहीं, कहीं भिन्न नहीं, गंता की आंतरिक अवस्था है।

लेकिन अगर उसे देखना हो, अगर उसके प्रति चैतन्य से भरना हो तो आंखें उलटाना सीखना पड़ेगा। ध्यान साधारणतया दृश्य से जुड़ा है। ऐसा मत सोचना कि तुम्हारे पास ध्यान नहीं है। तुम्हारे पास ध्यान है- उतना ही जितना बुद्धों के पास। रत्ती-भर कम नहीं। परमात्मा किसी को कम और ज्यादा देता नहीं। उसके बादल सब पर बराबर बरसते हैं। उसका सूरज सबके लिए उगता है। उसकी आंखों में न कोई छोटा है, न कोई बड़ा है। ऐसा मत सोचना कि कृष्ण को कुछ ज्यादा दिया था, कि बुद्ध को कुछ ज्यादा दिया था, कि ये रोशन हुए, कि ये जगमगाए। न खुद जगमगाए, बल्कि इनकी जगमगाहट से और भी लोग जगमगाए। दीयों से दीए जलते चले गए। ज्योति से ज्योति जले! जरूर इन्हें कुछ ज्यादा दे दिया होगा छिपा कर; हमें दिया नहीं, हम क्या करें? नहीं; ऐसा मत सोचना।

परमात्मा की तरफ से प्रत्येक को बराबर मिला है। रत्ती भर भेद नहीं। फिर हम अंधेरे में क्यों हैं? फिर कोई बुद्ध रोशन हो जाता है! और हम, जिनकी आंखें बाहर की ओर ही देखती रह जाती हैं, बुद्धू के बुद्धू क्यों रह जाते हैं! हमें जो मिला है, हमने उसे गलत से जोड़ा है। जैसे कोई सरिता मरुस्थल में खो जाए, जल तो लाए बहुत हिमालय से और मरुस्थल में खो जाए- ऐसी हमारी जीवन-ऊर्जा मरुस्थल में खोई जा रही है। बाहर विस्तार है मरुस्थल का। ध्यान तुम्हारे पास उतना ही है, जितना मेरे पास। लेकिन तुमने ध्यान वस्तुओं पर लगाया है। तुमने ध्यान किसी विषय पर लगाया है। तुम्हारा ध्यान हमेशा किसी चीज पर अटका है। चीजों को गिर जाने दो- चीजों को हट जाने दो। विषय वस्तु से मुक्त हो जाओ, मात्र ध्यान को रह जाने दो, निरालंब! और तब आंख उलट कर देखना शुरू करती है, मुड़ जाती है।

निरालंब ध्यान का नाम समाधि। आलंबन से भरे ध्यान का नाम संसार। जब तक आलंबन है, तब तक तुम बाहर जाओगे, क्योंकि आलंबन बाहर है। जब आलंबन नहीं, तब तुम भीतर आओगे। कोई उपाय ही न बचा तो तुम्हें भीतर आना ही होगा। ध्यान को कहीं ठहरना ही होगा। बाहर न ठहराओगे तो अपने-आप सहज सरलता से ध्यान लौट आता है।

इसलिए सारे ज्ञानी कहते हैं : बाहर से तादात्म्य छोड़ो। मन को बाहर मत अटकाओ। बाहर से सारे सेतु काट दो। और तब अचानक एक प्रकांड ऊर्जा घर की तरफ वापिस लौटती है; जैसे गंगा वापिस लौट पड़े गंगोत्री में, ऐसी आंदोलनकारी घटना घटती है। तुम्हारी ही ऊर्जा जब तुम्हारे ऊपर वापिस लौटती है, रोशन हो जाते हो तुम।

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